विद्यालय और चेतना सत्र
विद्यालय और चेतना सत्र
हम जानते हैं कि विद्यालय सामाजिक चेतना का केंद्र है। अगर परिभाषित किया जाय तो,-
"विद्यालय वह औपचारिक स्थल है जहाँ बच्चों का शारीरिक, मानसिक,बौद्धिक,सामाजिक, व्यवहारिक गुणों का विकास होता है ।"
प्रस्तुत आलेख में 'चेतना सत्र' मूल में है ।
आइये 'चेतना सत्र' की अवधारणा, उद्देश्य व उपयोगिता को समझते हैं ।
चेतना - शारीरिक और मानसिक रूप से जागृत होना या आसपास के वातावरण के तत्व का बोध होने या उन्हें समझने या उनकी बातों का मूल्यांकन करने का नाम चेतना है
चेतना सत्र-- चेतना सत्र नैतिक मूल्यों और संस्कारों की संजीवनी है। बच्चों में सद्गुणों के विकास विद्यालय में प्रातः कालीन चेतना सत्र का मूल उद्देश्य है । इस सभा में समयबद्धता, सदव्यवहार, विचारों की अभिव्यक्ति एवं नेतृत्व क्षमता का व्यवहारिकण होता है।
चेतना सत्र का उद्देश्य ईश वंदना के द्वारा विद्यालय में शैक्षणिक वातावरण तैयार करना । जिस तरह हर नया काम प्रारंभ करने से पहले लगभग हम सभी मन ही मन उस कार्य की सिद्धि के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। उसके बाद ही कार्य प्रारंभ करते हैं। कदाचित यह मनोवृति बचपन में विद्यालय जाने पर प्रार्थना सभा अर्थात चेतना सत्र के साथ पठन-पाठन आरंभ करने की आदत के चलते आरंभ हुई मानी जा सकती है ।तथ्य एवं विभिन्न शोधों से प्रमाणित हुआ है कि प्रत्येक व्यक्ति कोई नया कार्य आरंभ करने से पूर्व अपने इष्टदेव का स्मरण अवश्य करता है। ठीक उसी तरह प्रत्येक विद्यालय में शिक्षण कार्य दैनिक चेतना-सत्र के आयोजन से ही प्रारंभ होता है। चेतना सत्र किसी भी विद्यालय का एक ऐसा दर्पण है जो उस विद्यालय के भौतिक, शैक्षिक, सामाजिक, मानसिक, सांस्कृतिक और आध्यत्मिक वातावरण का साफ एवं स्पष्ट चित्र दिखलाता है ।
सरकारी निर्देशों के अनुसार भी चेतना सत्र से विद्यालयी कार्य की शुरुआत करनी होती है इसकी उपयोगिता इस प्रकार हो सकती है-
■बाल संसद/मीना मंच का क्रियान्वयन उसके निर्माण का व्यवहारिकरण ।
■शारीरिक सशैक्षणिक गतिविधियों से शारिरिक विकास ।
■ प्रसंग द्वारा नैतिक शिक्षा,मूल्यों व प्रेरणा का शिक्षण ।
■ समकालीन परिचर्चा से बच्चों में जागरुकता व सामाजिक भावना का विकास
■ मिशन गुणवत्ता में सहायक इत्यादि ।
धन्यवाद
केशव कुमार कश्यप
उ. म. वि. सरेंया टोला कमला मिश्र
प्रखण्ड- संग्रामपुर, जिला- पूर्वी चंपारण
बिहार
मो.- 8292172506
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